जजों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के न्यायिक अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य, काम के भारी बोझ और काम के दौरान होने वाले तनाव को दूर करने के लिए एक विशेष 'स्टैंडिंग कमेटी ऑन जुडिशियल वेल-बीइंग' (Judicial Well-being) का गठन किया है। यह कदम न्यायपालिका के भीतर काम करने वाले अधिकारियों के मानसिक और शारीरिक कल्याण को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
जस्टिस केवी विश्वनाथन करेंगे कमेटी की अध्यक्षता
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया द्वारा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टूबर) के अवसर पर इस कमेटी का गठन किया गया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस केवी विश्वनाथन को इस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इस कमेटी का मुख्य कार्य न्यायिक अधिकारियों के सामने आने वाली चुनौतियों का अध्ययन करना और उनके कल्याण के लिए संस्थागत उपाय सुझाना है।
इस महत्वपूर्ण कमेटी में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, जो निम्नलिखित हैं:
- सविता मल्होत्रा: पीजीआईएमआर (PGIMER) चंडीगढ़ की पूर्व डीन।
- रजत मित्रा: प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक।
- मृणाल कंवर: एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड।
- आरती सिंह: सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्रार।
किन चुनौतियों पर होगा ध्यान?
यह कमेटी न्यायिक अधिकारियों के कार्यक्षेत्र से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं की गहराई से जांच करेगी। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दे शामिल होंगे:
- काम के अत्यधिक और लंबे घंटे।
- कर्मचारियों और स्टाफ की कमी।
- प्रशासनिक दबाव और कार्यभार।
- वर्क-लाइफ बैलेंस (काम और निजी जीवन के बीच संतुलन) की कमी।
कमेटी न केवल इन समस्याओं की पहचान करेगी, बल्कि समय-समय पर कल्याणकारी उपायों की समीक्षा भी करेगी ताकि न्यायिक अधिकारियों के लिए एक सहायक कार्य वातावरण तैयार किया जा सके।
रिसर्च के आधार पर लिया गया निर्णय
यह पहल सुप्रीम कोर्ट के 'सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग' द्वारा जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की कार्य स्थितियों और उनके कल्याण पर किए गए विस्तृत शोध के बाद ली गई है। शोध के निष्कर्षों ने न्यायिक सेवा में व्याप्त तनाव और बुनियादी ढांचे की सीमाओं को उजागर किया है।
"शोध में न्यायिक सेवा के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है, जिसमें व्यावसायिक तनाव, कार्यभार, मानसिक और शारीरिक थकान, कर्मचारियों की कमी, बुनियादी ढांचे की सीमाएं, प्रशासनिक जिम्मेदारियां, तबादले, कार्य-जीवन संतुलन और संस्थागत सहायता की उपलब्धता शामिल है। ये निष्कर्ष चुनौतियों से निपटने के लिए साक्ष्य-आधारित संस्थागत उपाय विकसित करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।"
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि न्यायाधीशों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य न्याय वितरण प्रणाली की प्रभावशीलता, स्वतंत्रता और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।